योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

हमारे अभिजात पूर्वज साधारण जनसमुदाय को ज़माने से पैरों तले कुलचते रहे। इसके फलस्वरूप वे बेचारे एकदम असहाय हो गए, यहां तक कि अपने आपको मनुष्य मानना भी भूल गए। सदियों तक वे धनी-मानियों की आज्ञा सिर-आंखों पर रखकर केवल लकड़ी काटते और पानी भरते रहे हैं। उनकी यह धारण बन गई कि मानों उन्होंने गुलाम के रूप

160 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

ही में जन्म और यदि कोई व्यक्ति उनके प्रति सहानुभूति का शब्द कहता है, तो मैं प्रायः देखता


796 of 1197

हमारे अभिजात पूर्वज साधारण जनसमुदाय को ज़माने से पैरों तले कुलचते रहे। इसके फलस्वरूप वे बेचारे एकदम असहाय हो गए, यहां तक कि अपने आपको मनुष्य मानना भी भूल गए। सदियों तक वे धनी-मानियों की आज्ञा सिर-आंखों पर रखकर केवल लकड़ी काटते और पानी भरते रहे हैं। उनकी यह धारण बन गई कि मानों उन्होंने गुलाम के रूप

160 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

ही में जन्म और यदि कोई व्यक्ति उनके प्रति सहानुभूति का शब्द कहता है, तो मैं प्रायः देखता


796 of 1197