योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

बात यह है कि उसके किशोर मन पर पिता के व्यक्तित्व की गम्भीर छाप पड़ी। एक दिन नरेन्द्र ने जाने कैसे पिता से पूछा, ‘‘पिताजी, आप हमारे लिए क्या छोड़ रहे हैं?’’ विश्वनाथ ने दीवार पर लगे आइने की तरफ इशारा करते हुए उत्तर दिया, ‘‘जा, आइने में अपना चेहरा देख, तभी समझेगा कि मैंने तुझे क्या दिया है।’’

विश्वनाथ बेटों को सामंती ढंग से कभी डांटते-डपटते या बुरा-भला नहीं कहते थे, बल्कि उन्हें सुधारने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का


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बात यह है कि उसके किशोर मन पर पिता के व्यक्तित्व की गम्भीर छाप पड़ी। एक दिन नरेन्द्र ने जाने कैसे पिता से पूछा, ‘‘पिताजी, आप हमारे लिए क्या छोड़ रहे हैं?’’ विश्वनाथ ने दीवार पर लगे आइने की तरफ इशारा करते हुए उत्तर दिया, ‘‘जा, आइने में अपना चेहरा देख, तभी समझेगा कि मैंने तुझे क्या दिया है।’’

विश्वनाथ बेटों को सामंती ढंग से कभी डांटते-डपटते या बुरा-भला नहीं कहते थे, बल्कि उन्हें सुधारने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का


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