के इन समर्थकों ने इस महान सत्य की उपेक्षा कर दी कि मानवात्मा की क्षमता असीम है। प्रत्येक मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम है, यदि शिक्षा उसे उसकी ग्रहण-शक्ति के अनुसार शिक्षा दी जाए। यदि कोई शिक्षक किसी को कुछ समझा नहीं सकता, तो उसको स्वयं अपनी ही योग्यता पर रोना चाहिए कि वह लोगों को उनकी ग्रहण शक्ति के अनुसार शिक्षा नहीं दे पाता, बजाय इसके कि वह उन लोगों को कैसे कोसे और कहे कि तुम लोग अज्ञान और कुसंस्कार के बीच पड़े सड़ते रहो,
के इन समर्थकों ने इस महान सत्य की उपेक्षा कर दी कि मानवात्मा की क्षमता असीम है। प्रत्येक मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम है, यदि शिक्षा उसे उसकी ग्रहण-शक्ति के अनुसार शिक्षा दी जाए। यदि कोई शिक्षक किसी को कुछ समझा नहीं सकता, तो उसको स्वयं अपनी ही योग्यता पर रोना चाहिए कि वह लोगों को उनकी ग्रहण शक्ति के अनुसार शिक्षा नहीं दे पाता, बजाय इसके कि वह उन लोगों को कैसे कोसे और कहे कि तुम लोग अज्ञान और कुसंस्कार के बीच पड़े सड़ते रहो,