हाथ अगूंठा कटवा लिया। वे तो चाहते थे कि मेहनतकश जनता भ्रम-भ्रान्तियों और आदिम कुसंस्कारों में पड़ी देवी-देवताओं
161 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की पूजा करती रहे। श्रीकृष्ण फिर कहते हैं:
‘‘यदि तुम ज्ञानी भी हो, तब भी अज्ञानियों के बालसुलभ विश्वास को मत डिगाओ।’’
‘‘जो लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे वस्तुतः मेरी पूजा करते हैं।’’ शूद्रों के लिए पशु-तुल्य
बिना समझे-सोचे कर्म करते रहने ही का उपदेश है। हालांकि सवर्णों के अपने सब कर्म सकाम होते थे,
हाथ अगूंठा कटवा लिया। वे तो चाहते थे कि मेहनतकश जनता भ्रम-भ्रान्तियों और आदिम कुसंस्कारों में पड़ी देवी-देवताओं
161 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की पूजा करती रहे। श्रीकृष्ण फिर कहते हैं:
‘‘यदि तुम ज्ञानी भी हो, तब भी अज्ञानियों के बालसुलभ विश्वास को मत डिगाओ।’’
‘‘जो लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे वस्तुतः मेरी पूजा करते हैं।’’ शूद्रों के लिए पशु-तुल्य
बिना समझे-सोचे कर्म करते रहने ही का उपदेश है। हालांकि सवर्णों के अपने सब कर्म सकाम होते थे,