की परवाह न करके निष्काम भाव से कर्म करें। उनकी तो भक्ति भी निष्काम होनी चाहिए, ...दुःख इस जगत में अवश्य है, किन्तु इस कारण मैं ईश्वर को प्रेम करना नहीं छोड़ सकता। मै। उसकी उपासना इसलिए नहीं करता कि वह मेरे दुःख को हर ले। मैं उसको इसलिए प्रेम करता हूं कि वह साक्षात् प्रेम है।’’
पे्रम को भी तर्क और बुद्वि से परे ईश्वर की तरह अमूर्त बना दिया। दुःख और कष्ट तो मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड है। मोह-माया से, कर्म और दुःख से
की परवाह न करके निष्काम भाव से कर्म करें। उनकी तो भक्ति भी निष्काम होनी चाहिए, ...दुःख इस जगत में अवश्य है, किन्तु इस कारण मैं ईश्वर को प्रेम करना नहीं छोड़ सकता। मै। उसकी उपासना इसलिए नहीं करता कि वह मेरे दुःख को हर ले। मैं उसको इसलिए प्रेम करता हूं कि वह साक्षात् प्रेम है।’’
पे्रम को भी तर्क और बुद्वि से परे ईश्वर की तरह अमूर्त बना दिया। दुःख और कष्ट तो मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड है। मोह-माया से, कर्म और दुःख से