योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

मुक्त हो जाने क लिए वह कर्म भी निष्काम भाव से करे और प्रभु भक्ति भी निष्काम भाव से। उसे ज्ञान की, अपने कर्म और उसके फल को समझने की ज़रूरत ही क्या है?

अमेरिका पहुंचने के बाद विवेकानन्द ने 20 अगस्त, 1893 को आलासिंगा पेरूमल के नाम पत्र में लिखा था:

‘‘पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं, जो हिन्दू धर्म के समान इतने उच्च स्वर से मानवता के गौरव का उपदेश करता हो, और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिन्दू धर्म के समान गरीबों और


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मुक्त हो जाने क लिए वह कर्म भी निष्काम भाव से करे और प्रभु भक्ति भी निष्काम भाव से। उसे ज्ञान की, अपने कर्म और उसके फल को समझने की ज़रूरत ही क्या है?

अमेरिका पहुंचने के बाद विवेकानन्द ने 20 अगस्त, 1893 को आलासिंगा पेरूमल के नाम पत्र में लिखा था:

‘‘पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं, जो हिन्दू धर्म के समान इतने उच्च स्वर से मानवता के गौरव का उपदेश करता हो, और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिन्दू धर्म के समान गरीबों और


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