नीच जाति वालों का गला ऐसी क्रूरता से घोंटता हो। प्रभु ने मुझे दिखा दिया है कि इसमें धर्म का कोई दोष नहीं, वरन् दोष उनका है, जो ढोंगी और दम्भी है, जो ‘पारमार्थिक’ और व्यावहारिक सिद्वान्तों के रूप में अनेक प्रकार से अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करते हैं।’’
ये अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करने वाले विदेशी शासकों से मिलकर भारत की उस श्रमजीवी जनता को चूस रहे थे, जिसे विवेकानन्द ने अपने देश-भ्रमण के दौरान ज़िन्दगी का
नीच जाति वालों का गला ऐसी क्रूरता से घोंटता हो। प्रभु ने मुझे दिखा दिया है कि इसमें धर्म का कोई दोष नहीं, वरन् दोष उनका है, जो ढोंगी और दम्भी है, जो ‘पारमार्थिक’ और व्यावहारिक सिद्वान्तों के रूप में अनेक प्रकार से अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करते हैं।’’
ये अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करने वाले विदेशी शासकों से मिलकर भारत की उस श्रमजीवी जनता को चूस रहे थे, जिसे विवेकानन्द ने अपने देश-भ्रमण के दौरान ज़िन्दगी का