एक-एक दिन अंगुलियों पर गिनते देखा था। अमेरिका में भी यह भयंकर दृश्य उनकी दृष्टि में था और वे इस लम्बे पत्र को जारी रखते हुए आगे लिखते हैंः
‘‘उनकी नींद किसी तरह से टूटती ही नहीं। सदियों के अत्याचार के फलस्वरूप जो पीड़ा, दुःख, हीनता, दरिद्रता की आह भारत-गगन में गूंज रही है, उससे उनके
162 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
सुखकर जीवन को कोई ज़बरदस्त आघात नहीं लगता। युगों के जिस मानसिक नैतिक और शारीरिक अत्याचार ने ईश्वर के प्रतिमा रूपी मनुष्य को भारवाही पशु,
एक-एक दिन अंगुलियों पर गिनते देखा था। अमेरिका में भी यह भयंकर दृश्य उनकी दृष्टि में था और वे इस लम्बे पत्र को जारी रखते हुए आगे लिखते हैंः
‘‘उनकी नींद किसी तरह से टूटती ही नहीं। सदियों के अत्याचार के फलस्वरूप जो पीड़ा, दुःख, हीनता, दरिद्रता की आह भारत-गगन में गूंज रही है, उससे उनके
162 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
सुखकर जीवन को कोई ज़बरदस्त आघात नहीं लगता। युगों के जिस मानसिक नैतिक और शारीरिक अत्याचार ने ईश्वर के प्रतिमा रूपी मनुष्य को भारवाही पशु,