योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

दूध पीता और फल खाता और असंख्य प्राणायाम किया करता था। फलतः अपने को बहुत पवित्र समझता था। उसी गांव में एक कुलटा स्त्री रहती थी। प्रतिदिन संन्यासी उस स्त्री के पास जाता और उसे चेतावनी देता कि उसकी धृष्टता उसे नरक मंे ले जाएगी। बेचारी स्त्री अपने जीवन का ढंग नहीं बदल पाती थी, क्योंकि वही उसकी जीविका का एकमात्र उपाय था, फिर भी वह उस भयंकर भविष्य की कल्पना से सहम जाती थी, जिसे सन्ंयासी ने उनके समझ चित्रित किया था। वह रोती


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दूध पीता और फल खाता और असंख्य प्राणायाम किया करता था। फलतः अपने को बहुत पवित्र समझता था। उसी गांव में एक कुलटा स्त्री रहती थी। प्रतिदिन संन्यासी उस स्त्री के पास जाता और उसे चेतावनी देता कि उसकी धृष्टता उसे नरक मंे ले जाएगी। बेचारी स्त्री अपने जीवन का ढंग नहीं बदल पाती थी, क्योंकि वही उसकी जीविका का एकमात्र उपाय था, फिर भी वह उस भयंकर भविष्य की कल्पना से सहम जाती थी, जिसे सन्ंयासी ने उनके समझ चित्रित किया था। वह रोती


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