योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

थी और प्रभु से प्रार्थना करती थी कि वह उसे क्षमा करें। आखिर एक दिन वह स्त्री और संन्यासी दोनों ही मरे। स्वर्ग-दूत आए और स्त्री को स्वर्ग ले गए, जबकि संन्यासी को यमदूतों ने पकड़ा। वह चिल्लाया, ‘ऐसा क्यों? क्या मैंने पवित्र जीवन नहीं बिताया और लोगों को पवित्र होने की शिक्षा नहीं दी? मैं नरक में क्यों ले जाया जांऊ जबकि यह कुलटा स्त्री स्वर्ग में ले जाई जा रही है।’ यम ने उत्तर दिया, ‘वह अपवित्र कार्य करने के लिए विवश थी, पर


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थी और प्रभु से प्रार्थना करती थी कि वह उसे क्षमा करें। आखिर एक दिन वह स्त्री और संन्यासी दोनों ही मरे। स्वर्ग-दूत आए और स्त्री को स्वर्ग ले गए, जबकि संन्यासी को यमदूतों ने पकड़ा। वह चिल्लाया, ‘ऐसा क्यों? क्या मैंने पवित्र जीवन नहीं बिताया और लोगों को पवित्र होने की शिक्षा नहीं दी? मैं नरक में क्यों ले जाया जांऊ जबकि यह कुलटा स्त्री स्वर्ग में ले जाई जा रही है।’ यम ने उत्तर दिया, ‘वह अपवित्र कार्य करने के लिए विवश थी, पर


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