योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

उसका मन सदैव ईश्वर में लगा रहता था और वह मुक्ति मांगती थी, जो अब उसे मिली है। किन्तु इसके विपरीत तुम यद्यपि पवित्र कार्य ही करते थे और केवल पाप का विचार करते थे और अब तुम्हें उसी स्थान को जाना पड़ रहा है, जहां केवल पाप ही पाप है।’

अब इस कथा का विश्लेषण कीजिए।

पहली बात यह थक मानवता का गौरवगान करने वाले समाज में कोई भी स्त्री शरीर बेचने जैसा घृणित कार्य करने के लिए विवश क्यों हो? दूसरे वेश्यावृति शोषण की व्यवस्था का


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उसका मन सदैव ईश्वर में लगा रहता था और वह मुक्ति मांगती थी, जो अब उसे मिली है। किन्तु इसके विपरीत तुम यद्यपि पवित्र कार्य ही करते थे और केवल पाप का विचार करते थे और अब तुम्हें उसी स्थान को जाना पड़ रहा है, जहां केवल पाप ही पाप है।’

अब इस कथा का विश्लेषण कीजिए।

पहली बात यह थक मानवता का गौरवगान करने वाले समाज में कोई भी स्त्री शरीर बेचने जैसा घृणित कार्य करने के लिए विवश क्यों हो? दूसरे वेश्यावृति शोषण की व्यवस्था का


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