163 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वाले संन्यासी की तरह नरक में जाओगे, जहां सिर्फ पाप ही पाप है।
चैथे, विवेकानन्द स्वर्ग-नरक को सुख-सुविध प्राप्त धनी वर्ग की कल्पना मात्र मानते हैं। इसका प्रयोजन यह है कि एक तरफ दरिद्र जन को यह आश्वासन दिया जाता है कि पवित्र बनो तब तुम जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर स्वर्ग जाओगे और दूसरी तरफ कहीं वे असन्तुष्ट होकर उपद्रव या विद्रोह न करें, इसलिए नरक का भय दिखाया जाता है।
देख पराई चोपड़ी मत तरसाओ जीव।
163 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
वाले संन्यासी की तरह नरक में जाओगे, जहां सिर्फ पाप ही पाप है।
चैथे, विवेकानन्द स्वर्ग-नरक को सुख-सुविध प्राप्त धनी वर्ग की कल्पना मात्र मानते हैं। इसका प्रयोजन यह है कि एक तरफ दरिद्र जन को यह आश्वासन दिया जाता है कि पवित्र बनो तब तुम जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर स्वर्ग जाओगे और दूसरी तरफ कहीं वे असन्तुष्ट होकर उपद्रव या विद्रोह न करें, इसलिए नरक का भय दिखाया जाता है।
देख पराई चोपड़ी मत तरसाओ जीव।