के बेटों ही में रही। प्रजा पर उन्हीं का तो शासन रहा।
तीसरे, दशरथ ने जब राम को राजा बनाने के लिए प्रजा की राय पूछी थी, अगर प्रजा राम के नाम की मंजूरी न देकर अपने में से किसी सुबुद्व और सुयोग्य व्यक्ति का नाम लेती तो क्या उसे राजा बना दिया जाता?
विवेकानन्द लिखते हैं:
‘प्रजा को कर उगाहने या राज्य-कार्य मंे मतामत प्रकट करने का अधिकार न हिन्दू राजाओं के समय में था न बौद्व शासकों ही के समय में। यद्यपि महाराजा युधिष्ठिर वारणावत में वैश्यों और शूद्रों के घर गए थे,
के बेटों ही में रही। प्रजा पर उन्हीं का तो शासन रहा।
तीसरे, दशरथ ने जब राम को राजा बनाने के लिए प्रजा की राय पूछी थी, अगर प्रजा राम के नाम की मंजूरी न देकर अपने में से किसी सुबुद्व और सुयोग्य व्यक्ति का नाम लेती तो क्या उसे राजा बना दिया जाता?
विवेकानन्द लिखते हैं:
‘प्रजा को कर उगाहने या राज्य-कार्य मंे मतामत प्रकट करने का अधिकार न हिन्दू राजाओं के समय में था न बौद्व शासकों ही के समय में। यद्यपि महाराजा युधिष्ठिर वारणावत में वैश्यों और शूद्रों के घर गए थे,