अयोध्या की प्रजा ने श्री रामचन्द्र को युवराज बनाने के लिए प्रार्थना की थी, सीता के वनवास तक के लिए छिप-छिपकर सलाहें भी की थीं, तो भी प्रत्यक्ष रूप से, किसी स्वीकृत राज्य-नियम के अनुसार प्रजा किसी विषय में मुंह नहीं खोल सकती थी। वह अपने सामथ्र्य को अप्रत्यक्ष और अव्यवस्थित रूप से प्रकट किया करती थी। उस शक्ति का ज्ञान उस समय भी उसे नहीं था। जिस कौशल से छोटी-छोटी शक्तियां आपस में मिलकर प्रचंड बल संग्रह करती हैं, उनका भी पूरा अभाव था।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 202)
अयोध्या की प्रजा ने श्री रामचन्द्र को युवराज बनाने के लिए प्रार्थना की थी, सीता के वनवास तक के लिए छिप-छिपकर सलाहें भी की थीं, तो भी प्रत्यक्ष रूप से, किसी स्वीकृत राज्य-नियम के अनुसार प्रजा किसी विषय में मुंह नहीं खोल सकती थी। वह अपने सामथ्र्य को अप्रत्यक्ष और अव्यवस्थित रूप से प्रकट किया करती थी। उस शक्ति का ज्ञान उस समय भी उसे नहीं था। जिस कौशल से छोटी-छोटी शक्तियां आपस में मिलकर प्रचंड बल संग्रह करती हैं, उनका भी पूरा अभाव था।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 202)