ने भी यही लिखा है और प्रारम्भिक साम्यवाद के बाद वर्ग-विभाजित समाज के दास युग, सामन्त युग और पूंजीपति युग को विद्या-बल, बाहु-बल तथा धन-बल के युग कहकर कितनी सम्यक् व्याख्या की है कि वैश्य-कुल ने भी अपने को प्रजा वर्ग से अलग कर लिया है और परिणाम यह है कि इस ‘‘शक्ति की भी मृत्यु का बीज बोया जा चुका है।’’
पूंजीवाद अपनी प्रगतिशील भूमिका अदा करके साम्राज्यवाद में बदल चुका था। लेनिन ने ‘साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का अंतिम चरण’ पैम्फलेट (1916) में लिखा था,
ने भी यही लिखा है और प्रारम्भिक साम्यवाद के बाद वर्ग-विभाजित समाज के दास युग, सामन्त युग और पूंजीपति युग को विद्या-बल, बाहु-बल तथा धन-बल के युग कहकर कितनी सम्यक् व्याख्या की है कि वैश्य-कुल ने भी अपने को प्रजा वर्ग से अलग कर लिया है और परिणाम यह है कि इस ‘‘शक्ति की भी मृत्यु का बीज बोया जा चुका है।’’
पूंजीवाद अपनी प्रगतिशील भूमिका अदा करके साम्राज्यवाद में बदल चुका था। लेनिन ने ‘साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का अंतिम चरण’ पैम्फलेट (1916) में लिखा था,