का आधार होने पर भी उसने आपस में इतना भेद कर रखा है कि वह अपने सब अधिकारों से वंचित है, और जब तक ऐसा भाव रहेगा तब तक उसकी यही दशा रहेगी। साधारण कष्ट, घृणा या प्रीति आपस में सहानुभूति का कारण होती है। जिन नियम से हिंसक पशु दलबद्व हो शिकार करते फिरते हैं, उसी नियम से मनुष्य भी मिलकर रहते तथा जाति या राष्ट्र का संगठन करते हैं।’’
‘‘स्वार्थ ही स्वार्थ-त्याग का पहला शिक्षक है। व्यक्ति के स्वार्थों की रक्षा के लिए ही समष्टि
का आधार होने पर भी उसने आपस में इतना भेद कर रखा है कि वह अपने सब अधिकारों से वंचित है, और जब तक ऐसा भाव रहेगा तब तक उसकी यही दशा रहेगी। साधारण कष्ट, घृणा या प्रीति आपस में सहानुभूति का कारण होती है। जिन नियम से हिंसक पशु दलबद्व हो शिकार करते फिरते हैं, उसी नियम से मनुष्य भी मिलकर रहते तथा जाति या राष्ट्र का संगठन करते हैं।’’
‘‘स्वार्थ ही स्वार्थ-त्याग का पहला शिक्षक है। व्यक्ति के स्वार्थों की रक्षा के लिए ही समष्टि