167 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की तरह आंखों में चकाचैंध पैदा कर देती है। दूसरी ओर हमारे पूर्वजों का अपूर्व वीर्य असाधारण प्रतिभा और देव-दुर्लभ अध्यात्म-तत्व की वे कथाएं हैं, जिन्हें अनेक स्वदेशी और विदेशी ने प्रकट किया है, जो युग-युगान्तर की सहानुभूति के कारण समस्त समाज-शरीर में जल्दी दौड़ जाती है और बल तथा आशा प्रदान करती है।’’ (पृष्ठ 224-25)
हमारे अतीत में दोष नहीं, गुण भी हैं, बल्कि गुण अधिक हैं। कोई व्यक्ति सिर्फ गुणों ही से नहीं,
167 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
की तरह आंखों में चकाचैंध पैदा कर देती है। दूसरी ओर हमारे पूर्वजों का अपूर्व वीर्य असाधारण प्रतिभा और देव-दुर्लभ अध्यात्म-तत्व की वे कथाएं हैं, जिन्हें अनेक स्वदेशी और विदेशी ने प्रकट किया है, जो युग-युगान्तर की सहानुभूति के कारण समस्त समाज-शरीर में जल्दी दौड़ जाती है और बल तथा आशा प्रदान करती है।’’ (पृष्ठ 224-25)
हमारे अतीत में दोष नहीं, गुण भी हैं, बल्कि गुण अधिक हैं। कोई व्यक्ति सिर्फ गुणों ही से नहीं,