अपने दोषों से भी महान बनता है। इसी प्रकार राष्ट्र भी गुण और दोश दोनों से महान बनता है। हमें अपने पुरखों के गुणों से तो सीखना ही सीखना है, दोषों से भी सीखना है। वर्ग-विभाजन के बाद जहां व्यक्तिगत सम्पत्िा द्वारा आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक समृद्वि भी आई। हमारी देवमाला (मिथक) हमारी विलक्षण कल्पना-शक्ति का प्रमाण है। वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, संगीत, नृत्य इत्यादि सभी ललित कलाओं का अद्भुत विकास हुआ। वेद, उपनिषद् कपिल का सांख्यशास्त्र,
अपने दोषों से भी महान बनता है। इसी प्रकार राष्ट्र भी गुण और दोश दोनों से महान बनता है। हमें अपने पुरखों के गुणों से तो सीखना ही सीखना है, दोषों से भी सीखना है। वर्ग-विभाजन के बाद जहां व्यक्तिगत सम्पत्िा द्वारा आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक समृद्वि भी आई। हमारी देवमाला (मिथक) हमारी विलक्षण कल्पना-शक्ति का प्रमाण है। वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, संगीत, नृत्य इत्यादि सभी ललित कलाओं का अद्भुत विकास हुआ। वेद, उपनिषद् कपिल का सांख्यशास्त्र,