गौतम का न्यायशास्त्र, व्यास का मीमांसा, रामायण, महाभारत, चाणक्य-नीति, शुक्र-नीति, मनुस्मृति, पंचतंत्र, कथासरित सागर, अजन्ता, अलोरा और ताजमहल इत्यादि हमारे हज़ारों साल के वर्ग-विभाजित समाज की देन है। कल्पना कीजिए यह सब कितनी बड़ी साधना का फल है। विवेकानन्द ‘भारत का ऐतिहासिक क्रम-विकासस’ लेख में अपने इस महान अतीत पर गर्व करते हुए लिखते हैं:
‘‘विश्लेषणात्मक शक्ति एवं काव्य दृष्टि की निर्भीकता, ये ही हिन्दू जाति के निर्माण की दो अंतर्वर्ती शक्तियां हैं,
गौतम का न्यायशास्त्र, व्यास का मीमांसा, रामायण, महाभारत, चाणक्य-नीति, शुक्र-नीति, मनुस्मृति, पंचतंत्र, कथासरित सागर, अजन्ता, अलोरा और ताजमहल इत्यादि हमारे हज़ारों साल के वर्ग-विभाजित समाज की देन है। कल्पना कीजिए यह सब कितनी बड़ी साधना का फल है। विवेकानन्द ‘भारत का ऐतिहासिक क्रम-विकासस’ लेख में अपने इस महान अतीत पर गर्व करते हुए लिखते हैं:
‘‘विश्लेषणात्मक शक्ति एवं काव्य दृष्टि की निर्भीकता, ये ही हिन्दू जाति के निर्माण की दो अंतर्वर्ती शक्तियां हैं,