योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

होने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन-भर पचा न सके।’’

3 जनवरी, 1895 को विवेकानन्द ने शिकागो से जस्टिस सुब्रह्मण्यम के नाम पत्र लिखा था:

‘‘भारत के शिक्षित समाज से मैं इस बात पर सहमत हूं कि समाज का अमूल परिवर्तन करना आवश्यक है, पर यह किया किस तरह जाए? सुधारकों की सब कुछ नष्ट कर डालने की रीति व्यर्थ सिद्व हो चुकी है। मेरी योजना यह है-हमने अतीत काल में कुछ बुरा नहीं किया निश्चय ही नहीं किया। हमारा समाज खराब नहीं, बल्कि


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होने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन-भर पचा न सके।’’

3 जनवरी, 1895 को विवेकानन्द ने शिकागो से जस्टिस सुब्रह्मण्यम के नाम पत्र लिखा था:

‘‘भारत के शिक्षित समाज से मैं इस बात पर सहमत हूं कि समाज का अमूल परिवर्तन करना आवश्यक है, पर यह किया किस तरह जाए? सुधारकों की सब कुछ नष्ट कर डालने की रीति व्यर्थ सिद्व हो चुकी है। मेरी योजना यह है-हमने अतीत काल में कुछ बुरा नहीं किया निश्चय ही नहीं किया। हमारा समाज खराब नहीं, बल्कि


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