भी रहा। आधुनिक शास्त्र-ग्रंथों में भी जातियों का आपस में खाना-पीना निषेध नहीं हुआ है, और न किसी प्राचीन ग्रंथ में उनका ब्याह-शादी करना मना है। तो फिर
169 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
भारत के अधः पतन का कारण क्या था? जाति संबंधी इस भाव का त्याग। जैसे गीता कहती है-‘जाति नष्ट हुई कि संसार भी नष्ट हुआ’ अब क्या यह सत्य प्रतीत होता है कि इस विविधता का नाश होते ही जगत् का भी नाश हो जाएगा? आजकल का वर्ग-विभाग यथार्थ में जाति नहीं हैं,
भी रहा। आधुनिक शास्त्र-ग्रंथों में भी जातियों का आपस में खाना-पीना निषेध नहीं हुआ है, और न किसी प्राचीन ग्रंथ में उनका ब्याह-शादी करना मना है। तो फिर
169 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
भारत के अधः पतन का कारण क्या था? जाति संबंधी इस भाव का त्याग। जैसे गीता कहती है-‘जाति नष्ट हुई कि संसार भी नष्ट हुआ’ अब क्या यह सत्य प्रतीत होता है कि इस विविधता का नाश होते ही जगत् का भी नाश हो जाएगा? आजकल का वर्ग-विभाग यथार्थ में जाति नहीं हैं,