सिद्वान्तों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता।’’
‘‘ऐसा ही ईश्वर मैंने अपने जीवन में देखा है और उनके आदर्शों का पालन करने के लिए जीवित हूं।’’ अभिप्राय रामकृष्ण परमहंस से है।’’ स्मृति और पुराण सीमित बुद्वि वाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेद तथा द्वेष भाव विद्यमान है, ग्रहण करने योग्य है, शेष सबका त्याग कर देना चाहिए। उपनिषद् और गीता सच्चे शास्त्र हैं, और रामकृष्ण, बुद्व, चैतन्य,
सिद्वान्तों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता।’’
‘‘ऐसा ही ईश्वर मैंने अपने जीवन में देखा है और उनके आदर्शों का पालन करने के लिए जीवित हूं।’’ अभिप्राय रामकृष्ण परमहंस से है।’’ स्मृति और पुराण सीमित बुद्वि वाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेद तथा द्वेष भाव विद्यमान है, ग्रहण करने योग्य है, शेष सबका त्याग कर देना चाहिए। उपनिषद् और गीता सच्चे शास्त्र हैं, और रामकृष्ण, बुद्व, चैतन्य,