अंहभाव का अल्पांश भी रहने से किसी चीज़ की प्राप्ति हो सकती हैं?
‘‘मुझे एक बड़ा विभेद और दिखाई देता है-मेरे मन में दिनांेदिन यह विश्वास बढ़ता जा रहा है कि जाति-भाव सबसे अधिक भेद उत्पन्न करने वाला और माया का मूल है। सब प्रकार का जाति-भेद चाहे वह जन्मगत हो या गुणगत, बंधन ही है। कुछ मित्र यह सुझाव देते हैं, ‘‘सच है, मन में ऐसा ही समझो, परन्तु बाहर व्यावहारिक जगत् में जाति जैसे भेदों को बनाए रखना उचित है।’’
विवेकानन्द समझौते
अंहभाव का अल्पांश भी रहने से किसी चीज़ की प्राप्ति हो सकती हैं?
‘‘मुझे एक बड़ा विभेद और दिखाई देता है-मेरे मन में दिनांेदिन यह विश्वास बढ़ता जा रहा है कि जाति-भाव सबसे अधिक भेद उत्पन्न करने वाला और माया का मूल है। सब प्रकार का जाति-भेद चाहे वह जन्मगत हो या गुणगत, बंधन ही है। कुछ मित्र यह सुझाव देते हैं, ‘‘सच है, मन में ऐसा ही समझो, परन्तु बाहर व्यावहारिक जगत् में जाति जैसे भेदों को बनाए रखना उचित है।’’
विवेकानन्द समझौते