के कायल नहीं थे। जब तक जाति के गुणगत आधार को सही समझा, तब तक उसकी व्याख्या उसी दृष्टि से की। और जब यह समझ लिया कि गुणगत मान लेने में भी दोष है तब जाति मनुष्य मनुष्य में भेद का कारण है, तब वे उपनिषदों और गीता की बात भी भूल गए। उन्हें किसी शास्त्र का प्रमाण प्रिय न था, राष्ट्रीय एकता प्रिय थी। अतएव लिखा है:
‘‘मन में एकता का भाव कहने के लिए उसे स्ािापित करने की कातर निर्वार्य चेष्टा और बाह्य जगत् में राक्षसों का नरक, नृत्य,
के कायल नहीं थे। जब तक जाति के गुणगत आधार को सही समझा, तब तक उसकी व्याख्या उसी दृष्टि से की। और जब यह समझ लिया कि गुणगत मान लेने में भी दोष है तब जाति मनुष्य मनुष्य में भेद का कारण है, तब वे उपनिषदों और गीता की बात भी भूल गए। उन्हें किसी शास्त्र का प्रमाण प्रिय न था, राष्ट्रीय एकता प्रिय थी। अतएव लिखा है:
‘‘मन में एकता का भाव कहने के लिए उसे स्ािापित करने की कातर निर्वार्य चेष्टा और बाह्य जगत् में राक्षसों का नरक, नृत्य,