योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अत्याचार और उत्पीड़न-निर्धनों के लिए साक्षात् यमराज! परन्तु यदि वही अछूत काफी धनी हो जाए तो? अरे वह तो धर्म का रक्षक है।’’

धर्म के ठेकेदारों, जात-पांत के समर्थकों की पाखंडवृत्ति को विवेकानन्द ने अब बखूबी समझ लिया था। धर्म के विधि-निषेध में अपनी कुलीनता की रक्षा और भक्ति-मुक्ति में उनके वर्ग-स्वार्थ को भी भली-भांति देख लिया था। इन्हीं लोगों ने विवेकानन्द पर विदेश में मलेच्छों का खान-पान अपनाने का आरोप लगाया था। वे उनके इस छिछले आरोप का उत्तर देते हुए लिखते हैं:


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अत्याचार और उत्पीड़न-निर्धनों के लिए साक्षात् यमराज! परन्तु यदि वही अछूत काफी धनी हो जाए तो? अरे वह तो धर्म का रक्षक है।’’

धर्म के ठेकेदारों, जात-पांत के समर्थकों की पाखंडवृत्ति को विवेकानन्द ने अब बखूबी समझ लिया था। धर्म के विधि-निषेध में अपनी कुलीनता की रक्षा और भक्ति-मुक्ति में उनके वर्ग-स्वार्थ को भी भली-भांति देख लिया था। इन्हीं लोगों ने विवेकानन्द पर विदेश में मलेच्छों का खान-पान अपनाने का आरोप लगाया था। वे उनके इस छिछले आरोप का उत्तर देते हुए लिखते हैं:


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