योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



‘‘सबसे अधिक अपने अध्ययन से मैंने यह जाना है कि धर्म के विधिनिषेधादि नियम शुद्र के लिए नहीं हैं, यदि वह भोजन में या विदेश जाने में कुछ विचार दिखाए तो उसके लिए वह सब व्यर्थ है, केवल निरर्थक परिश्रम। मैं शुद्र हूं, मलेच्छ हूं, इसलिए मेरा इस सब झंझटों से क्या संबंध? मेरे लिए मलेच्छ का भोजन हुआ तो क्या, और शुद्र का हुआ तो क्या! पुरोहितांे की लिखी हुई पुस्तकों में नहीं। अपने पूर्वजांे के कार्य का फल पुरोहित को भोगने दो, मैं तो भगवान की वाणी का अनुसरण करूंगा,


852 of 1197



‘‘सबसे अधिक अपने अध्ययन से मैंने यह जाना है कि धर्म के विधिनिषेधादि नियम शुद्र के लिए नहीं हैं, यदि वह भोजन में या विदेश जाने में कुछ विचार दिखाए तो उसके लिए वह सब व्यर्थ है, केवल निरर्थक परिश्रम। मैं शुद्र हूं, मलेच्छ हूं, इसलिए मेरा इस सब झंझटों से क्या संबंध? मेरे लिए मलेच्छ का भोजन हुआ तो क्या, और शुद्र का हुआ तो क्या! पुरोहितांे की लिखी हुई पुस्तकों में नहीं। अपने पूर्वजांे के कार्य का फल पुरोहित को भोगने दो, मैं तो भगवान की वाणी का अनुसरण करूंगा,


852 of 1197