इधर-उधर भटकते रह जाते हैं। ऐसा होते मैंने कई बार प्रत्यक्ष देखा है। इन विविध विषयों पर विचार करते हुए आपको पत्र लिखने का मेरा मन नहीं था। इन सब मतभेदों के होते हुए भी यदि आपका प्रेम मेरे प्रति पहले ही जैसा होता तो इसे बड़े आनन्द का विषय समझूंगा।’’ (षष्ठ खंड)
1893 में इन्हीं प्रमदादास मित्र को विवेकानन्द ने ‘पूज्यपाद’ से संबोधित किया था और इस संबोधन की व्याख्या करते हुए उनकी विद्वता को श्रद्वांजलि अर्तित की थी। लेकिन
इधर-उधर भटकते रह जाते हैं। ऐसा होते मैंने कई बार प्रत्यक्ष देखा है। इन विविध विषयों पर विचार करते हुए आपको पत्र लिखने का मेरा मन नहीं था। इन सब मतभेदों के होते हुए भी यदि आपका प्रेम मेरे प्रति पहले ही जैसा होता तो इसे बड़े आनन्द का विषय समझूंगा।’’ (षष्ठ खंड)
1893 में इन्हीं प्रमदादास मित्र को विवेकानन्द ने ‘पूज्यपाद’ से संबोधित किया था और इस संबोधन की व्याख्या करते हुए उनकी विद्वता को श्रद्वांजलि अर्तित की थी। लेकिन