1897 में इन्हीं प्रमदादास मित्र को विवेकानन्द ने ‘प्रिय महाशय’ से सम्बोधित किया और उनकी विद्वता पर व्यंग्यात्मक भाषा में कड़ा प्रहार किया। कारण यह कि शास्त्र-वाक्य की रट लगाने और अपनी ही ‘मुक्ति’ की चिंता करने वाले विद्वान तथा पुरोहित लोग अपने को घोंघे की तरह विद्वता के खोल में बंद कर लेते हैं, बल्कि यों कहिए कि विकास क्रम की उल्टी प्रक्रिया द्वारा मनुष्य से कूपमंडूक में परिणत हो जाते हैं। लेकिन विवेकानन्द ने जीवन सेवा और जीवों में भी देश की शोषित,
1897 में इन्हीं प्रमदादास मित्र को विवेकानन्द ने ‘प्रिय महाशय’ से सम्बोधित किया और उनकी विद्वता पर व्यंग्यात्मक भाषा में कड़ा प्रहार किया। कारण यह कि शास्त्र-वाक्य की रट लगाने और अपनी ही ‘मुक्ति’ की चिंता करने वाले विद्वान तथा पुरोहित लोग अपने को घोंघे की तरह विद्वता के खोल में बंद कर लेते हैं, बल्कि यों कहिए कि विकास क्रम की उल्टी प्रक्रिया द्वारा मनुष्य से कूपमंडूक में परिणत हो जाते हैं। लेकिन विवेकानन्द ने जीवन सेवा और जीवों में भी देश की शोषित,