योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

1898 को समाज के गुण-दोषों का विस्तार से विश्लेषण करते हुए श्रीमती मृणलिनी बसु को एक लम्बे पत्र में लिखा है:

‘‘शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वह पठन-मात्र है? क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। अब सोचो कि शिक्षा क्या वह है, जिसने निरन्तर इच्छा-शक्ति को बलपूर्वक पीढ़ी दर पीढ़ी रोककर नष्ट कर दिया है,


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1898 को समाज के गुण-दोषों का विस्तार से विश्लेषण करते हुए श्रीमती मृणलिनी बसु को एक लम्बे पत्र में लिखा है:

‘‘शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वह पठन-मात्र है? क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। अब सोचो कि शिक्षा क्या वह है, जिसने निरन्तर इच्छा-शक्ति को बलपूर्वक पीढ़ी दर पीढ़ी रोककर नष्ट कर दिया है,


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