जिसके प्रभाव से नये विचारों की बात ही जाने दो, पुराने विचार भी एक-एक करके लोप होते चले जा रहे हैं? क्या वह शिक्षा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे यंत्र बना रही है? जो स्वयं चालित यंत्र के समान सुकर्म करता है, जो उसकी अपेक्षा अपनी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति और बुद्वि के बल से अनुचित कर्म करने वाला मेरे विचार से श्रेयस्कर है। जो मनुष्य मिट्टी के पुतले, निर्जीव यंत्र या पत्थरों के ढेर के सदृश हों, क्या उनका समूह समाज कहला सकता है?
जिसके प्रभाव से नये विचारों की बात ही जाने दो, पुराने विचार भी एक-एक करके लोप होते चले जा रहे हैं? क्या वह शिक्षा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे यंत्र बना रही है? जो स्वयं चालित यंत्र के समान सुकर्म करता है, जो उसकी अपेक्षा अपनी स्वतंत्र इच्छा-शक्ति और बुद्वि के बल से अनुचित कर्म करने वाला मेरे विचार से श्रेयस्कर है। जो मनुष्य मिट्टी के पुतले, निर्जीव यंत्र या पत्थरों के ढेर के सदृश हों, क्या उनका समूह समाज कहला सकता है?