इस प्रकार का समाज कैसे उन्नत हो सकता है। यदि इस प्रकार कल्याण सम्भव होता, तो सैकड़ों वर्षों से दास होने के बदले हम पृथ्वी का सबसे प्रतापी राष्ट्र होते, और यह भारत मूर्खता की शान होने के बदले, विद्या के अनन्त स्न्न्ाोत का उत्पत्ति
172 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
स्थान होता।
‘‘तब क्या आत्म त्याग एक गुण नहीं है? बहुतों के सुख के लिए बलिदान करना क्या सर्वश्रेष्ठ पुण्य कर्म नहीं है? अवश्य है। परन्तु बंगला कहावत के अनुसार
इस प्रकार का समाज कैसे उन्नत हो सकता है। यदि इस प्रकार कल्याण सम्भव होता, तो सैकड़ों वर्षों से दास होने के बदले हम पृथ्वी का सबसे प्रतापी राष्ट्र होते, और यह भारत मूर्खता की शान होने के बदले, विद्या के अनन्त स्न्न्ाोत का उत्पत्ति
172 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
स्थान होता।
‘‘तब क्या आत्म त्याग एक गुण नहीं है? बहुतों के सुख के लिए बलिदान करना क्या सर्वश्रेष्ठ पुण्य कर्म नहीं है? अवश्य है। परन्तु बंगला कहावत के अनुसार