योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

उसका अन्तर्निहित ब्रह्यभाव कभी व्यक्त हुआ है? तुम रोने से क्यों डरते हो? रोना न छोड़ो, रोने से नेत्रों में निर्मलता आती है और अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है। उस समय भेद की दृष्टि, मनुष्य, पशु, वृक्ष आदि धीरे-धीरे लोप होने लगते हैं और सब स्ािानों में सब वस्तुओं में, अनन्त ब्रह्या की अनुभूति होने लगती है। तब-

समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परांगतिम् । (13/28)

-सर्वत्र ही ईश्वर


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उसका अन्तर्निहित ब्रह्यभाव कभी व्यक्त हुआ है? तुम रोने से क्यों डरते हो? रोना न छोड़ो, रोने से नेत्रों में निर्मलता आती है और अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है। उस समय भेद की दृष्टि, मनुष्य, पशु, वृक्ष आदि धीरे-धीरे लोप होने लगते हैं और सब स्ािानों में सब वस्तुओं में, अनन्त ब्रह्या की अनुभूति होने लगती है। तब-

समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परांगतिम् । (13/28)

-सर्वत्र ही ईश्वर


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