को समभाव से उपस्थित देखकर आत्मा को आत्मा से हानि न पहुंचाकर परम गति को प्राप्त करता है।’’ (सप्तम खंड)
विवेकानन्द ने राष्ट्र के अधःपतन पर, भारत माता को गुलामी की ज़जीर में जकड़ी देखकर हमेशा आठ-आठ आंसू रोए, इससे उनके नेत्रों में निर्मलता आई और वे सचमुच दूरदर्शी बनते चले गए। 1900 में जब वे दोबारा विशेष-यात्रा पर गए
173 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
तो उन्होंने ‘यूरोप यात्रा संस्मरण’ में भारत के उच्च वर्गों को संबोधित करते हुए लिखा:
को समभाव से उपस्थित देखकर आत्मा को आत्मा से हानि न पहुंचाकर परम गति को प्राप्त करता है।’’ (सप्तम खंड)
विवेकानन्द ने राष्ट्र के अधःपतन पर, भारत माता को गुलामी की ज़जीर में जकड़ी देखकर हमेशा आठ-आठ आंसू रोए, इससे उनके नेत्रों में निर्मलता आई और वे सचमुच दूरदर्शी बनते चले गए। 1900 में जब वे दोबारा विशेष-यात्रा पर गए
173 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
तो उन्होंने ‘यूरोप यात्रा संस्मरण’ में भारत के उच्च वर्गों को संबोधित करते हुए लिखा: