योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

से कहानियां सुन रहा हूं! तुम्हारे साथ प्रत्यक्ष वार्ता करके घर लौटता हूं तो जान पड़ता है, चित्रशाला में तस्वीरें देख आया।...भविष्य के तुम लोग शून्य हो, इत, लोप, लुप। भूत-भारत-शरीर के रक्त-मांस-हीन कंकाल कुल, तुम लोग क्यों नहीं जल्दी धूलि में परिणत हो वायु में मिल जाते....तुम लोग शून्य में विलीन हो जाओ और फिर एक नवीन भारत निकल पड़े। निकले हल की मुट्ठियां पकड़े किसानों के झोंपड़े से, जाली, मोची, मेहतरों की झोंपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से,


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से कहानियां सुन रहा हूं! तुम्हारे साथ प्रत्यक्ष वार्ता करके घर लौटता हूं तो जान पड़ता है, चित्रशाला में तस्वीरें देख आया।...भविष्य के तुम लोग शून्य हो, इत, लोप, लुप। भूत-भारत-शरीर के रक्त-मांस-हीन कंकाल कुल, तुम लोग क्यों नहीं जल्दी धूलि में परिणत हो वायु में मिल जाते....तुम लोग शून्य में विलीन हो जाओ और फिर एक नवीन भारत निकल पड़े। निकले हल की मुट्ठियां पकड़े किसानों के झोंपड़े से, जाली, मोची, मेहतरों की झोंपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से,


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