भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाज़ार से। निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों पर्वतों से। इन लोगों ने सहó-सहó वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है-उससे पाई है अपूर्व सहिष्णुता। सनातन दुःख उठाया, जिसने पाई है अटल जीवन शक्ति। ये लोग मुट्ठी-भर सत्तू खाकर दुनिया उलट दे सकेंगे। आधी रोटी मिली तो तीनों लोक में इनका तेज न अटेगा। ये रक्त बीज के प्राणांे से मुक्त हैं और पाया है सदाचार बल, जो तीनों लोकों में नहीं है। इतनी शान्ति,
भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाज़ार से। निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों पर्वतों से। इन लोगों ने सहó-सहó वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है-उससे पाई है अपूर्व सहिष्णुता। सनातन दुःख उठाया, जिसने पाई है अटल जीवन शक्ति। ये लोग मुट्ठी-भर सत्तू खाकर दुनिया उलट दे सकेंगे। आधी रोटी मिली तो तीनों लोक में इनका तेज न अटेगा। ये रक्त बीज के प्राणांे से मुक्त हैं और पाया है सदाचार बल, जो तीनों लोकों में नहीं है। इतनी शान्ति,