इतनी प्रीति, इतना प्यार, बेज़बान रहकर इतना खटना और काम के वक्त सिंह का विक्रम! टतीत के कंकाल समूह! यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा अंगूठियां-फेंक दो इनके बीच, जाओ, सिर्फ कान खड़े रखो। तुम ज्योंही विलीन होगे, उसी वक्त सुनोगे, कोटि जीवभूत स्पन्दिनी, त्रैलोक्य कम्पनकारिणी भावी भारत की उद्बोधन ध्वनि ‘वाह गुरू की फतह!’ ’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 167)
और फिर दूर-सदियों दूर इतिहास में झांकते हुए आगे लिखा है:
‘‘सोचकर देखो बात क्या है। वे जो लोग किसान हैं वे कोरी जुलाहे,
इतनी प्रीति, इतना प्यार, बेज़बान रहकर इतना खटना और काम के वक्त सिंह का विक्रम! टतीत के कंकाल समूह! यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा अंगूठियां-फेंक दो इनके बीच, जाओ, सिर्फ कान खड़े रखो। तुम ज्योंही विलीन होगे, उसी वक्त सुनोगे, कोटि जीवभूत स्पन्दिनी, त्रैलोक्य कम्पनकारिणी भावी भारत की उद्बोधन ध्वनि ‘वाह गुरू की फतह!’ ’’ (अष्टम खंड, पृष्ठ 167)
और फिर दूर-सदियों दूर इतिहास में झांकते हुए आगे लिखा है:
‘‘सोचकर देखो बात क्या है। वे जो लोग किसान हैं वे कोरी जुलाहे,