जो भारत के नगण्य मनुष्य हैं, विजाति-विजित स्वजाति-निन्दित छोटी-छोटी जातियां हैं, वही लगातार चुपचाप काम करती जा रही है, अपने परिश्रम का फल भी नहीं पर रही हैं। परन्तु धीरे-धीरे प्राकृतिक नियम से दुनिया में कितने परिवर्तन होते जा रहे हैं। देश, सभ्यता तथा सत्ता उलटते-पुलटते जा रहे हैं। हे भारत के श्रमजीवियों! तुम्हारे नीरव, सदा ही निन्दित हुए परिश्रम के फलस्वरूप बाबिल, ईरान, अलेकजंद्रिया, ग्रीस,
174 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जो भारत के नगण्य मनुष्य हैं, विजाति-विजित स्वजाति-निन्दित छोटी-छोटी जातियां हैं, वही लगातार चुपचाप काम करती जा रही है, अपने परिश्रम का फल भी नहीं पर रही हैं। परन्तु धीरे-धीरे प्राकृतिक नियम से दुनिया में कितने परिवर्तन होते जा रहे हैं। देश, सभ्यता तथा सत्ता उलटते-पुलटते जा रहे हैं। हे भारत के श्रमजीवियों! तुम्हारे नीरव, सदा ही निन्दित हुए परिश्रम के फलस्वरूप बाबिल, ईरान, अलेकजंद्रिया, ग्रीस,
174 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द