रणवीर, काव्यवीर, सबकी आंखों पर, सबके पूज्य हैं, परन्तु यहां कोई नहीं देखता, यहां कोई एक वाह-वाह भी नहीं करता, जहां सब लोग घृणा करते हैं, वहां वास करती है अपार सहिष्णुता, अन्य प्रीति और निर्भीक कार्यकारिता, हमारे गरीब, घर-द्वार पर दिन-रात मुंह बंद कर कत्र्तव्य करते जा रहे हैं, उनमें क्या वीरत्व नहीं है? बड़ा कापुरूष भी सहज में प्राण दे देता है, घोर स्वार्थ पर कभी निष्काम हो जाता है, परन्तु अत्यंत छोटे-से कार्य में भी सबके अज्ञात भाव से जो वैसी ही निस्वार्थता,
रणवीर, काव्यवीर, सबकी आंखों पर, सबके पूज्य हैं, परन्तु यहां कोई नहीं देखता, यहां कोई एक वाह-वाह भी नहीं करता, जहां सब लोग घृणा करते हैं, वहां वास करती है अपार सहिष्णुता, अन्य प्रीति और निर्भीक कार्यकारिता, हमारे गरीब, घर-द्वार पर दिन-रात मुंह बंद कर कत्र्तव्य करते जा रहे हैं, उनमें क्या वीरत्व नहीं है? बड़ा कापुरूष भी सहज में प्राण दे देता है, घोर स्वार्थ पर कभी निष्काम हो जाता है, परन्तु अत्यंत छोटे-से कार्य में भी सबके अज्ञात भाव से जो वैसी ही निस्वार्थता,