कत्र्तव्यपराणयता दिखाते हैं, वे ही धन्य हैं-वे तुम लोग हो भारत के हमेशा के पैरों तले कुचले हुए श्रमजीवियों!-तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूं।’’ (पृष्ठ 190)
यह वेदान्त नहीं, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। श्रमजीवियों को वेदान्त ने कब इतिहास के निर्माता तथा पूज्य माना? उसने तो उन्हें नीच और शुद्र ठहराया। वेदान्त ने कब अपने परिश्रम का फल न पाने वाले के लिए आंसू बहाए? उसने तो उन्हें निष्काम भाव से पशुवत भार ढोने ही की शिक्षा
कत्र्तव्यपराणयता दिखाते हैं, वे ही धन्य हैं-वे तुम लोग हो भारत के हमेशा के पैरों तले कुचले हुए श्रमजीवियों!-तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूं।’’ (पृष्ठ 190)
यह वेदान्त नहीं, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। श्रमजीवियों को वेदान्त ने कब इतिहास के निर्माता तथा पूज्य माना? उसने तो उन्हें नीच और शुद्र ठहराया। वेदान्त ने कब अपने परिश्रम का फल न पाने वाले के लिए आंसू बहाए? उसने तो उन्हें निष्काम भाव से पशुवत भार ढोने ही की शिक्षा