दी। विवेकानन्द के इतना कहने पर ‘भारत के श्रमजीवियों!-तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूं। लकीर के फकीर वेदान्तियों और तथाकथित सुधारकों ने उन्हें उलाहना दिया कि तुम नीच जातियों की-घृणित शूद्रों की खामख्वाह खुशामद करते हो। विवेकानन्द ने इस उलाहने का उत्तर यों दिया, ‘‘इन लोगों से मैं एक बात पूछना चाहता हूं कि इस देश के लोगों की खुशामद करके मुझे क्या लाभ होगा? यदि भूखों मर जाऊं तो देश के लिए एक मुट्ठी अन्न भी नहीं देंगे, उल्टे
दी। विवेकानन्द के इतना कहने पर ‘भारत के श्रमजीवियों!-तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूं। लकीर के फकीर वेदान्तियों और तथाकथित सुधारकों ने उन्हें उलाहना दिया कि तुम नीच जातियों की-घृणित शूद्रों की खामख्वाह खुशामद करते हो। विवेकानन्द ने इस उलाहने का उत्तर यों दिया, ‘‘इन लोगों से मैं एक बात पूछना चाहता हूं कि इस देश के लोगों की खुशामद करके मुझे क्या लाभ होगा? यदि भूखों मर जाऊं तो देश के लिए एक मुट्ठी अन्न भी नहीं देंगे, उल्टे