विदेशों से अकाल-पीड़ितों और अनाथों को खिलाने के लिए मैं जो मांग-जांचकर लाया हूं, उसे भी वे हड़पने का प्रयत्न करते हैं। पागलों को जो दवा खिलाने जाएगा, उसे वे दो-चार लप्पड़-थप्पड़ देंगे ही। पर उन्हें सहकर भी जो उन्हें दवा खिलाता है, वही उनका सच्चा मित्र है।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 56-57)
और 6 अप्रैल, 1897 को ‘भारती’ की सम्पादिका श्रीमती सरला घोषाल के नाम पत्र लिखा था:
‘‘मैंने जापान में सुना कि वहां की लड़कियांे को यह विश्वास है
विदेशों से अकाल-पीड़ितों और अनाथों को खिलाने के लिए मैं जो मांग-जांचकर लाया हूं, उसे भी वे हड़पने का प्रयत्न करते हैं। पागलों को जो दवा खिलाने जाएगा, उसे वे दो-चार लप्पड़-थप्पड़ देंगे ही। पर उन्हें सहकर भी जो उन्हें दवा खिलाता है, वही उनका सच्चा मित्र है।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 56-57)
और 6 अप्रैल, 1897 को ‘भारती’ की सम्पादिका श्रीमती सरला घोषाल के नाम पत्र लिखा था:
‘‘मैंने जापान में सुना कि वहां की लड़कियांे को यह विश्वास है