वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं।’’ (षष्टम खंड)
देश से और देशवासियों से प्यार करना कोई विवेकानन्द से सीखे। इसी प्यार के कारण उन्होंने सैद्वान्तिक रूप से वेदान्त दर्शन की चरम सीमा को पार किया और इसी प्यार के कारण व्यावहारिक रूप से वे धर्म के विराम-चिहृ को लांघकर कई कदम आगे बढ़ गए-और कहा कि मैं सोशलिस्ट हूं क्योंकि भूखे
वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं।’’ (षष्टम खंड)
देश से और देशवासियों से प्यार करना कोई विवेकानन्द से सीखे। इसी प्यार के कारण उन्होंने सैद्वान्तिक रूप से वेदान्त दर्शन की चरम सीमा को पार किया और इसी प्यार के कारण व्यावहारिक रूप से वे धर्म के विराम-चिहृ को लांघकर कई कदम आगे बढ़ गए-और कहा कि मैं सोशलिस्ट हूं क्योंकि भूखे