रहने से आधे पेट खा लेना बेहतर है। उन्होंने वर्ग-चेतना और वर्ग-संघर्ष की बात चाहे नहीं कही, पर अपने इस प्यार के कारण उन्हें वे अंतर्दृष्टि मिली, जिसने पाश्चात्य पूंजीवादी समाज के सारे प्रपंचों को छेदकर यह भली-भांति देख लिया कि लोकतंत्र अपनी स्वार्थ-सिद्वि के लिए, थैलीशाहों की तानाशाही है और ये ही लोग अपन स्वार्थ-सिद्वि के लिए, अपनी मंडियों और मुनाफों के लिए युद्व छेड़ते और गरीब लोगों को उसमें ईंधन की तरह झोंकते हैं।
‘प्राच्य और पाश्चात्य’ लेख में वे लिखते है:
रहने से आधे पेट खा लेना बेहतर है। उन्होंने वर्ग-चेतना और वर्ग-संघर्ष की बात चाहे नहीं कही, पर अपने इस प्यार के कारण उन्हें वे अंतर्दृष्टि मिली, जिसने पाश्चात्य पूंजीवादी समाज के सारे प्रपंचों को छेदकर यह भली-भांति देख लिया कि लोकतंत्र अपनी स्वार्थ-सिद्वि के लिए, थैलीशाहों की तानाशाही है और ये ही लोग अपन स्वार्थ-सिद्वि के लिए, अपनी मंडियों और मुनाफों के लिए युद्व छेड़ते और गरीब लोगों को उसमें ईंधन की तरह झोंकते हैं।
‘प्राच्य और पाश्चात्य’ लेख में वे लिखते है: