से पृथक् है । जड़ का क्रम विकास चैतन्य की विकास-प्रणाली का सूचक या प्रतीक स्वरूप है, किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में वहम रहने के कारण हम
177 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
अभी तक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं कर सके। जब तक हम उस उच्चतर भूमि में नहीं पहुंच जाते, जहां हम अपनी अन्तरात्मा के परम लक्षणों को प्रकट करने के उपयुक्त यंत्र बन जाते हैं, तब तक हम प्रकृत व्यक्तित्व की प्राप्ति नहीं कर सकते।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 376)
से पृथक् है । जड़ का क्रम विकास चैतन्य की विकास-प्रणाली का सूचक या प्रतीक स्वरूप है, किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में वहम रहने के कारण हम
177 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
अभी तक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं कर सके। जब तक हम उस उच्चतर भूमि में नहीं पहुंच जाते, जहां हम अपनी अन्तरात्मा के परम लक्षणों को प्रकट करने के उपयुक्त यंत्र बन जाते हैं, तब तक हम प्रकृत व्यक्तित्व की प्राप्ति नहीं कर सकते।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 376)