योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अनजान, अकल्पित तरंग आती है, क्रमशः प्रबल होती जाती है, दूसरी छोटी-छोटी तरंगों को मानो निगलकर वह अपने में मिला लेती है, और इस तरह अत्यन्त विपुलकार और प्रबल होकर वह एक बहुत बड़ी बाढ़ के रूप में समाज पर वेग से गिरती है और कोई उसकी गति को रोक नहीं सकता। इस समय भी वैसा ही हो रहा है। यदि तुम्हारे पास आंखें हैं, तो तुम उसे अवश्य देखोगे। यदि तुम्हारा हृदय खुला है तो तुम उसको अवश्य ग्रहण करोगे। अंधा, बिलकुल अंधा है वह, जो समय के चिहृ नहीं देख रहा है,


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अनजान, अकल्पित तरंग आती है, क्रमशः प्रबल होती जाती है, दूसरी छोटी-छोटी तरंगों को मानो निगलकर वह अपने में मिला लेती है, और इस तरह अत्यन्त विपुलकार और प्रबल होकर वह एक बहुत बड़ी बाढ़ के रूप में समाज पर वेग से गिरती है और कोई उसकी गति को रोक नहीं सकता। इस समय भी वैसा ही हो रहा है। यदि तुम्हारे पास आंखें हैं, तो तुम उसे अवश्य देखोगे। यदि तुम्हारा हृदय खुला है तो तुम उसको अवश्य ग्रहण करोगे। अंधा, बिलकुल अंधा है वह, जो समय के चिहृ नहीं देख रहा है,


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