किया। इससे पहले वे हिन्दू धर्म और दर्शन के बारे में कुछ नहीं जानते थे। एक प्रकार से यह उनका दूसरा जन्म था। सूफीवाद का प्रभाव उन पर पहले ही पड़ चुका था और अब वेदान्त पढ़ लेने से वे एकेश्वरवादी हो गए और उन्होंने फारसी में ‘तुहफतुल-मुहुद्रदीन’ नाम की पुस्तक लिखी जो मूर्ति-पूजा के विरूद्व थी। इससे उनके रूढ़िवादी पिता चिढ़ गए और बेटे को घर से निकाल दिया। उन्होंने चार बरस तक भारत और तिब्बत का भ्रमण किया। तिब्बत में बुद्वमत के रूढ़िवाद
किया। इससे पहले वे हिन्दू धर्म और दर्शन के बारे में कुछ नहीं जानते थे। एक प्रकार से यह उनका दूसरा जन्म था। सूफीवाद का प्रभाव उन पर पहले ही पड़ चुका था और अब वेदान्त पढ़ लेने से वे एकेश्वरवादी हो गए और उन्होंने फारसी में ‘तुहफतुल-मुहुद्रदीन’ नाम की पुस्तक लिखी जो मूर्ति-पूजा के विरूद्व थी। इससे उनके रूढ़िवादी पिता चिढ़ गए और बेटे को घर से निकाल दिया। उन्होंने चार बरस तक भारत और तिब्बत का भ्रमण किया। तिब्बत में बुद्वमत के रूढ़िवाद