अध्ययन इस समय तक यूरोप में भी किसी ने नहीं किया था। 1803 में पिता की मृत्यु के बाद घरवालों ने उन्हें वापस ले लिया। 1805 से 1815 तक उन्होंने कई स्थानों पर कलेक्टर
180 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के नीचे काम किया। इस बीच में उन्होंने शंकर भाष्य तथा पांच उपनिषदों का बंगला में अनुवाद किया और वेदान्त चर्चा जारी रखी। 1815 में अवकाश प्राप्त करके वे स्थायी रूप से कलकत्ता में रहने लगे। अब उन्होंने अपना सारा समय समाज-सुधार और धर्म सुधार के लिए अर्पित कर दिया।
अध्ययन इस समय तक यूरोप में भी किसी ने नहीं किया था। 1803 में पिता की मृत्यु के बाद घरवालों ने उन्हें वापस ले लिया। 1805 से 1815 तक उन्होंने कई स्थानों पर कलेक्टर
180 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
के नीचे काम किया। इस बीच में उन्होंने शंकर भाष्य तथा पांच उपनिषदों का बंगला में अनुवाद किया और वेदान्त चर्चा जारी रखी। 1815 में अवकाश प्राप्त करके वे स्थायी रूप से कलकत्ता में रहने लगे। अब उन्होंने अपना सारा समय समाज-सुधार और धर्म सुधार के लिए अर्पित कर दिया।