की अपेक्षा उनके लिए बस यही एक महाकाव्य सत्य की कसौटी हो गया, इस संबंध में पाश्चात्य की क्या राय है, धर्म-गुरूओं को भगा देना चाहिए, वेदों को जला डालना चाहिए, क्योंकि पाश्चात्य ने ऐसा कहा है-इस प्रकार की खलबली के भावों से भारत में एक ऐसी लहर उठी, जिसे हम तथाकथ्ति ‘सुधार’ के नाम से पुकारते हैं।’’ (सप्तम खंड, पृष्ठ 239)
इस समय राममोहन राय ने जो भूमिका अदा की वह तथाकथित सुधारकों से एकदम भिन्न थी। उन्होंने अनुसंधान का मार्ग
की अपेक्षा उनके लिए बस यही एक महाकाव्य सत्य की कसौटी हो गया, इस संबंध में पाश्चात्य की क्या राय है, धर्म-गुरूओं को भगा देना चाहिए, वेदों को जला डालना चाहिए, क्योंकि पाश्चात्य ने ऐसा कहा है-इस प्रकार की खलबली के भावों से भारत में एक ऐसी लहर उठी, जिसे हम तथाकथ्ति ‘सुधार’ के नाम से पुकारते हैं।’’ (सप्तम खंड, पृष्ठ 239)
इस समय राममोहन राय ने जो भूमिका अदा की वह तथाकथित सुधारकों से एकदम भिन्न थी। उन्होंने अनुसंधान का मार्ग