और कुप्रथाओं के विरूद्व राममोहन राय के प्रचार के हिन्दू कट्टरपंथी भी चैंके। उन्होंने राजा सर राधाकान्त के नेतृत्व में ‘धर्म-सभा’ स्थापित की। वे मूर्ति-पूजा और ‘सती-दाह’ का समर्थन करते थे और उनका कहना था कि राजा राममोहन राय जो सुधार चाहते हैं वह शास्त्र के प्रतिकूल है और उससे ‘हिन्दू धर्म नष्ट हो जाएगा।’ अतएव वेदान्त आन्दोलन के प्रतिवाद में सर राधाकान्त का दल भी व्यर्थ की छींटाकशी करने लगा। लेकिन इस वाद-विवाद का परिणाम
और कुप्रथाओं के विरूद्व राममोहन राय के प्रचार के हिन्दू कट्टरपंथी भी चैंके। उन्होंने राजा सर राधाकान्त के नेतृत्व में ‘धर्म-सभा’ स्थापित की। वे मूर्ति-पूजा और ‘सती-दाह’ का समर्थन करते थे और उनका कहना था कि राजा राममोहन राय जो सुधार चाहते हैं वह शास्त्र के प्रतिकूल है और उससे ‘हिन्दू धर्म नष्ट हो जाएगा।’ अतएव वेदान्त आन्दोलन के प्रतिवाद में सर राधाकान्त का दल भी व्यर्थ की छींटाकशी करने लगा। लेकिन इस वाद-विवाद का परिणाम