वे विद्या सुन्दर की कविताओं से तािा आशुकवियों के अश्लील एवं कुरूचिपूर्ण संगीतमय वागयुद्व के अभिनय से तृप्त होते थे। कलकत्ता के बाबू लोग बुलबुल की लड़ाई, पतंगों के पेच तथा चमकीली भड़कदार पोशाक पहन वेश्याओं के साथ बगीचों में मौज उड़ाने ही में मस्त रहते थे। और जब राममोहन राय का आन्दोलन आगे बढ़ा और नवजीवन की तरंग दौड़ी, तो बाबुओं के बैठकखाने में भट्टाचार्य की चैपालों में, गावों के चंडी-मंडपों में, जहां देखिए वहां राममोहन राय की
वे विद्या सुन्दर की कविताओं से तािा आशुकवियों के अश्लील एवं कुरूचिपूर्ण संगीतमय वागयुद्व के अभिनय से तृप्त होते थे। कलकत्ता के बाबू लोग बुलबुल की लड़ाई, पतंगों के पेच तथा चमकीली भड़कदार पोशाक पहन वेश्याओं के साथ बगीचों में मौज उड़ाने ही में मस्त रहते थे। और जब राममोहन राय का आन्दोलन आगे बढ़ा और नवजीवन की तरंग दौड़ी, तो बाबुओं के बैठकखाने में भट्टाचार्य की चैपालों में, गावों के चंडी-मंडपों में, जहां देखिए वहां राममोहन राय की